
शिमला। यह कहानी किसी बड़े कॉरपोरेट आइडिया की नहीं, बल्कि संवेदना, समझ और साझेदारी से जन्मे एक मिशन की है। हिमाचल की पहाड़ियों में पली-बढ़ी माउंटेन बाउंटीज़ आज एक ब्रांड है, लेकिन इसकी जड़ें जंगल बचाने और ग्रामीण महिलाओं को सम्मानजनक आजीविका देने के संकल्प में हैं।
इस पहल की सूत्रधार हैं ममता चंदर। माउंटेन बाउंटीज़ की शुरुआत किसी बिज़नेस प्लान से नहीं, बल्कि एक सवाल से हुई, जंगल क्यों सिमट रहे हैं? जवाब गांवों में मिला। कुल्लू क्षेत्र में काम के दौरान यह स्पष्ट हुआ कि ईंधन और रोज़गार की कमी ने महिलाओं को जंगलों पर निर्भर कर दिया है। समाधान भी वहीं से निकला, यदि महिलाओं को स्थानीय संसाधनों से वैकल्पिक, टिकाऊ रोज़गार मिले, तो जंगलों पर दबाव अपने आप कम होगा।
यहीं से जन्म हुआ जागृति नामक एनजीओ और सहकारी मॉडल का, जिसने गांव की महिलाओं के साथ मिलकर स्थानीय अधिशेष उत्पादों की पहचान की। महिलाओं के सुझावों से खुबानी और आड़ू के तेल जैसे उत्पाद सामने आए, जिन्होंने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी ध्यान खींचा। आगे चलकर विशेषज्ञों की मदद से रोज़हिप, बिच्छू बूटी (नेटल) और खुबानी जैसे जंगली वनस्पतियों को मूल्यवर्धित उत्पादों में बदला गया, जहां स्वाद, सेहत और प्रकृति तीनों का सम्मान हुआ।

ममता चंदर कहती हैं, टिकाऊपन किसी एक व्यक्ति की उपलब्धि नहीं, बल्कि साझा प्रणाली का परिणाम है, जहां महिलाएं एक-दूसरे की मदद करती हैं।
आज माउंटेन बाउंटीज़ पूरी तरह गांव की महिलाओं द्वारा एकत्र किए गए कच्चे माल पर निर्भर है। 15 वर्षों से अधिक समय में यह पहल एक मज़बूत सप्लाई चेन, रिटेल बिज़नेस, एनजीओ और महिला सहकारिताओं का नेटवर्क बन चुकी है।
हिमालय की खुशबू समेटे ये उत्पाद केवल बाज़ार तक नहीं पहुंचे, बल्कि एक संदेश भी लेकर आए कि प्रकृति की रक्षा और आजीविका का विकास साथ-साथ संभव है। माउंटेन बाउंटीज़ की यह यात्रा बताती है कि जब समाधान समुदाय के साथ मिलकर गढ़े जाएं, तो वे टिकाऊ भी होते हैं और प्रेरक भी।
यह कहानी सिर्फ एक ब्रांड की नहीं, बल्कि महिलाओं की सामूहिक शक्ति, जंगलों की सुरक्षा और हिमालयी आत्मनिर्भरता की कहानी है, जहां हर उत्पाद में पहाड़ों की खुशबू और उम्मीद की चमक शामिल है।